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Saturday, September 12, 2015

मै और मेरी डिग्री, अक्सर ये बातें करते हैं.

रात की तनहाइयों मे,
दिन की परछाइयां मे,
बैठकर अकेले मे,
मै और मेरी डिग्री,
अक्सर ये बाते करते है,
कि तुम ना होती,
तो ऐसा होता,
तुम ना होती,
तो वैसा होता।

तुम ना होती,
तो बच जाते वो लाखो रूपये,
जो पिताजी ने खेत बेचकर लगाये थे,
कुछ बैंक से कर्ज भी उठाये थे,
सब तुम्हारी खातिर ऐ डिग्री,

तुम ना होती,
तो मेरी रातें कैसी होती,
दारू के साथ वो बातें कैसे होती,
वो मशीन डिजाइन क्या होता,
वो फ्लुइड मैकेनिक्स कैसे होती,

तुम ना होती,
तो वो चार साल कैसे होते,
जो बिताये मैने रट्टा मारते,
कभी फर्रो के दम पर,
कभी नकल के भरोसे,
मेरे पास होने की,
मगर वजह क्या होती।

तुम ना होती,
तो मेरी प्रोक्सी कैसे होती,
बिना फाइल के वो वाइवा कैसे होती,
बिना लेक्चर के वो क्लास कैसी होती।

आज तुम साथ होकर भी,
लगती हो गुनाह सी,
जैसे पाना तुमको,
कोई दौलत हराम की,

आज फिर सुना घर पर,
बेरोजगारी के ताने,
वही रोज के राग,
वही पुराने अफसाने,

सुना है अब तुम्हारी कोई औकात नही,
तुझमे अब वो पहले जैसी बात नही,
अब वो इज्जत, वो जज्बात नही,
खुश है वो, तुम जिसके साथ नही,

अब डिग्रीधारियों की हालत,
कुछ यूं हो चली है,
ना साथी ना प्रेमी,
ना इज्जत मिली है।

मै और मेरी डिग्री,
अक्सर ये बाते करते है,
कि तुम्हारा अब कोई वजूद नही,
साथ हो सबके, मगर मौजूद नही,
तुझे पाना जितना कठिन था,
तुम्हें रख पाना उससे भी कठिन है,
ये जीत है अगर, तो जीत ये कठिन है,
तुम्हें पा लेने का गम, खोने से कठिन है।

मै और मेरी डिग्री,
अक्सर ये बातें करते है,
कि अब जबकि,
तुम्हारी कोई जरूरत नही है,
तो क्यो ना चनाजोर गरम बेचूं,
तुझमे लपेटकर,
तेरी नालायकी की सजा,
सिर्फ मै ही क्यों सहूं।
मै और मेरी डिग्री,
अक्सर ये बातें करते है।
कि तुम ना होती,
तो कैसा होता।

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