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Sunday, July 27, 2014

Untamed pen of a Bhopali.

बारिश में भीगते भोपाल शहर की हरियाली देखते ही बनती है। ऐसा लगता है जैसे पूरे शहर के उपर किसी ने हरा चादर ओढा दिया हो। उस चादर के बीच-बीच मे से झांकती सफेद-पीली सरकारी इमारतें। BHEL के द्वारा बनाये पीले रंग की जर्जर मकानों की दीवारों पर काली-सफेद काई की लकीरें इन खंडहरों की शोभा मे चार चांद लगा रहे है। रिमझिम फुहारों और मनमोहक हरियाली के बीच घिरे टूटे-फूटे इन मकानों से निकलता हल्का-हल्का धुंआ बरबस ही अपनी ओर खींच ले जाता है। अंदर का दृष्य और भी सुहावन। टूटे इंटो के पीढे पर बैठे चार-पाँच युवक देशी शराब के तरलता को सिगरेट की कश के सहारे हलक से नीचे उतार रहे है। उसपर भी कोई बवाल करे तो कहाँ तक उचित है? भगवान शिव ने भी तो विषपान किया था।

बीच-बीच में मोहल्ले की पिंकी, कृति और किरण की बातें छिड जाती है। एक-दूसरे की माता-बहिनों के प्रति संस्कार सूचक शब्दो के बिना तो खैर कोई वाक्य पूरा ही नही होता है। हलांकि दारू-सिगरेट के लिए पैसे का इंतजाम कहाँ से हो रहा है ये सोचने योग्य बात है। चुनाव था तो पैसा भी मिलता था और दारू भी। इज्जत और पूछ परख भी कोई कम ना थी। मुश्किल ये है कि ऐसे रोजगार का अवसर पांच साल मे एक बार ही आता है। लेकिन कहते है कि जहाँ चाह होता है वहाँ राह निकल ही आता है। BHEL ने हजारों की संख्या मे मकान बनवा कर छोडा है। उसमें लकडी-लोहे के खिडकी-दरवाजे किस काम के? जब तक BHEL के मकानों मे खिडकी है तब तक महफिल सकती रहेगी। जिस माध्यम से वो संसाधन जुटाते है वो चोरी कहलाता है लेकिन तभी याद आता है कि जिन नेताओं के लिए इन्होंने प्रचार किया था उनसे ये लाख गुणा अच्छे है। अगर ये मंत्रालय पहुँच जाये तो करोडो-अरबो की चोरी ना होगी। इनकी ना इतनी औकात है, ना इतनी हिम्मत। सरकारी कामकाज के टेक्निकल पचडे मे मत पडिए, हमारे कुछ बडे नेताओं से ज्यादा पढे-लिखे होते है ये अवारा लडके।

खैर बात हो रही थी भोपाल की। भोपाल शहर के सडको के किनारे सरकारी-सार्वजनिक इमारतों के दीवारों पर सुसज्जित लाल-गुलाबी पान-गुटखे की पीक हमारे शहर की पहचान बनते जा रहे है। तरह-तरह की बेतरतीब डिजाइन के नक्शे बनाते पान के जेट दरअसल हमारे कला और संस्कृति के प्रतीक है। ये शहर की खूबसूरती पर एक प्रश्नचिन्ह लगाते निशान से बढकर कुछ और ही है। हलांकि मै समझता हूं कि जिस मुल्क में होली पर रंग लगाने के विवाद में दंगे हो जाते हों, जहाँ मन्दिर-मस्जिद पर लाउडस्पीकर बांधने के लिए कत्लेआम हो जाता हो वहाँ पान के सुर्ख लाल रंग से शहर को रंगने के बाद भी शांति कायम रखना मेरे शहर की उपलब्धि है। मेरे शहर का जर्दा, गर्दा और परदा तो विश्व-प्रसिद्ध है।

दूसरे शहरों की तरह मेरे शहर में भी अघोषित मूत्रालय वहीं होता है जहाँ बडे-बडे शब्दों मे लिखा हो "यहाँ पेशाब करना मना है". अमा कमाल करते हो। प्रकृति से लिया हुआ जल प्रकृति को लौटाने में कैसी मनाही? ये तो धार्मिक कार्य है। तेरा तुझको अर्पण। ये सब एक प्रायोगिक मजाक से कम नही लगता है। सेंस आफ ह्यूमर तो हमारे शहर के जर्रे-जर्रे मे हैं। मानो या ना मानो।

शहर की लडकियों के 'Why should boys have all the fun' वाली स्कूटी के पीछे चलते 'कूल ड्यूड' की मोटरसाईकल उसके पापा की आर्थिक हैसियत का एहसास कराती है। फब्तियाँ कसते उसके मुखारविंद बडी तन्मयता से संस्कारो का पाठ पढा जाते है। बिना लाइसेंस के बाइक दौडाते देश के भविष्य को पकडे जाने पर 30 रूपये से लेकर 300 रूपये तक ट्रैफिक पुलिस वाले को देना पडता है। ये दिल्ली थोडी है कि कह देंगे 'जानता है मेरा बाप कौन है?'. ये भोपाल है भोपाल। यहाँ कानून तोडने पर जुर्माने की रकम आपके Negotiation Skill से तय होती है। Bargaining is the superpower of Indian Middle Class. खैर, जो भी हो। गली के नुक्कड़ पर बैठे अधेड- बुजुर्ग चाय की चुस्की पर कश्मीर और यूक्रेन के मसले सुलझा देते है। अगले ही पल शर्माजी कि बिटिया शार्ट-स्कर्ट पहने गुजरती है तो मुद्दा छिडता है सभ्यता और संस्कृति का। उसके कपडो की लम्बाई के अनुपात मे उसका चरित्र तय होता है। "इसी वजह से तो आजकल बलात्कार की घटनाएं बढ रही है" कहते हुए नेकचंद जी ने सारा साइकोलोजी एक वाक्य में बयान कर दिया। ये न्यूज वाले नाहक ही मामले को तूल दे रहे है। बैठाओ बेटियों को घर में, सारी समस्या का हल मिल गया। सभ्य समाज में संस्कृति के ठेकेदारों ने ही तो आजतक हमारी विराट सभ्यता को बचा रखा है, वरना ये पश्चिमी परिवेश में पल-बढ रहे पथ-भ्रष्ट युवाओं ने तो जैसे असभ्यता के प्रचार का बीडा उठा लिया हो।

भीम-बैठिका के दीवारों पर 'I love you Reena. You are my life.' लिखने वाले युवा ये नही समझते है कि पश्चिमी सभ्यता हमारे बहुमूल्य संस्कारों को दीमक की तरह खोखला किए जा रहे है। देश का भविष्य सेक्स और नग्नता का पुजारी बनता जा रहा है। ये हमारी संस्कृति नही है। होना भी नही चाहिए। खजुराहो और अजन्ता के देश मे नग्नता कतई बर्दाश्त नही किया जाना चाहिए। सारा दोष इस पश्चिमी रहन-सहन और वहाँ की संस्कृति का है। जब हमारे वत्साययन ऋषि कामसूत्र जैसे महान धार्मिक ग्रन्थ की रचना कर रहे थे तब गैलीलियों और कापरनिकस जैसे कुछ तुक्ष मनुष्य पृथ्वी और सूर्य के समीकरणों को खोज रहे थे। ग्राहम बेल टेलीफोन बना रहे थे जिसका विकसित रूप मोबाइल आज हमारे बेटियों के बिगडने का मूल कारण है। उस पश्चिमी सभ्यता से हम सीख भी रहे है तो अश्लीलता? हद्द है।

तम्बाकू को हथेली पर रगड कर होठों मे दबाते जुम्मन चाचा कहते है कि सेक्स भारत की संस्कृति नही है। विश्व की दूसरी सबसे बडी आबादी वाले देश के युवाओं के मन मे सेक्स जैसी नापाक भावना ये अमेरिकी फिल्में ही पनपा रही है। वरना रिप्रोडक्सन तो फोटोसिनथेसिस से भी होता है। अभी मुद्दे ने रंग पकडा ही था कि उनका आठवां बेटा अब्दुल आकर कहता है कि अम्मी बुला रही हैं। जुम्मन चाचा उठ कर चले जाते है। फातिमा चाची पेट से हैं। दसवें का नम्बर है, खयाल तो रखना ही पडेगा। अगर अल्लाह का फजल रहा तो अगले साल तक क्रिकेट टीम तैयार हो जायेगी। गर्भनिरोधक वगैरह अगर पश्चिमी सभ्यता ना होता तो फैमिली प्लानिंग के बारे मे सोच भी लेते।

जुम्मन चाचा चले गये। लेकिन महफिल अभी उठी नही है। उठेगी भी कैसे मियां? ये भोपाल है भोपाल। कहते है शाम होते ही भोपाली जाग जाते है। कहने को बहुत कुछ है लेकिन समय इतना इजाजत नही दे रहा है। समय मिला तो फिर आयेंगे।

चलते है। आप भी चलते रहिए। चलना ही तो जिन्दगी है।

Wednesday, July 16, 2014

The last ritual

"If anyone is going to light his pyre, it would be me. It has to be no one but me. How could they stop me from performing the post-death rituals of my father when I am the eldest child he has? I have rights, too.  No. I won't let Mukesh light the pyre since he is 7 years younger to me." She murmured as she was talking to her image in the mirror.
 
She was all alone in her room, latched from inside. In her family, she has her younger brother, Mukesh and youngest sister, Neha, apart from their parents. She always wanted to prove her worth as her mother used to tell her it-would-be-lot-better-if-you-were-a-boy, almost all her childhood and her adolescent. She was the most obedient child anyone could have ever noticed in her colony. She was the ideal kid by all mean any parent could ever dream off. Ever. Except that she was not a kid. Although, it never mattered to her father but her grandmother always hated her for not being a male. She'd always used to curse her mother for not producing a baby boy, and one day; she died ranting without seeing the baby boy, Mukesh taking birth. Her biggest wish realizes after her death.
****
"But why didn't Aditi light the pyre?" She asked her mother when she came to know that her neighbor had died in a road mishap and his 3 year old child has to perform the rituals, with the help of family, of course.
"Because Aditi is only 6 years old. She is in your class. Doesn't she" her mother told her.
"But Rohit is even younger, and then how come he did that?" She argued.
"Because she is a girl. She can't. She couldn't." Her mother concluded the conversation.
"So does that mean I won't be allowed to light the pyre of father too?" She asked skeptically as she approached her mother behind her in kitchen.
"What made you think such stupid stuffs? You are only 6. Go study." Her mother irked.
"No. I want to know. Now."
"Well, you can't. Now stop irritating me. I have chores to do."
****
 
She clearly remembers all the conversations she ever had after the time when she gained the conscious. She also remembers how her father once told her that she would perform the last rite of his. Although she knew he didn't mean it, but she always wished.
"He always calls me BETA. So that implies that I am his son." A voice raised in her head.
"But you are still a girl. And girls are not allowed to perform any such rites." Another voice in her head countered.
"No. I can and I will. No one would stop me." She decided.
"But the society won't let you. You know that very well."
"Damn the society. I wish I could. It'd be my birthday wish. I want it." She said to herself.
 
A knock on the door has broken her chain of self-conversation. She looked into the clock. It was 12 in the midnight. She stood and opens the door.
"Happy birthday BETA. Many-many happy returns of the day. Ask me whatever you want, my son. What is that you wish for this birthday?" her father asked her as he hugged her and kissed her on her forehead.  She realized that all the crazy things she was thinking when her father is still alive. She couldn't speak.
 
Regret, maybe.
 

Sunday, July 13, 2014

Accidental Human

AD 2025.

“But why can”t we have a car, Papa? I hate walking so long.” Pappu asked his father Guddu as they were returning from his school.
“Because I can”t pay the tax as much as the cost of the car.” , Guddu told his son.

“But most of the kids in my class have cars in their family. How come they can afford it while we can”t? You earn better than them, right?”
“Yes Pappu, I earn more but they don”t have to pay any tax. And we are not discussing this topic, Okay?”

“Okay... Ummm... can we take the bus, then?” kid chuckled.

“You don”t like standing in bus, do you? Seats are reserved for SC/ST and OBCs. We don”t even belong to minority or this state. And please don’t ask anything else for now. I am tired working all day in office.” Guddu replied.

For next 15 minutes, they walked in silence. But the kid was not able to walk any longer, so was the case with his father. They sat on a bench in a park but had to pay a fine of 250 Rs. because the bench was reserved for SC/ST only. As they reached their home, there was no electricity. It was Tuesday. There is power cut on every Tuesday, Thursday and Saturday to provide sufficient power supply to minorities’ houses in order to ensure their upliftment. They slept in boiling hot summer night. They had to. They were from General Category.

Next morning, it was Independence Day. The newspaper was colorful and words appeared as if carved over tricolor. Pappu was elated. He is having a holiday. All his friends also have holiday. Even Ramesh, who got admission in top school of the city with meager 53% marks. Pappu was denied because he was a general category student; despite his 96% marks are better than pappu’s. Marks are just a number. A state of mind. But he never understands why he was denied the admission. Although it felt weird when Ramesh used to tell him about all the interesting stuff he’d do in school. The facilities he boasts about, the English speaking teachers. He envied. It’s least he can do.

But he played all day with his friends. It was much needed holiday. He didn’t care about the homework assignment for which he is gonna be reprimanded for sure. He and few of his friends will be punished while some other will watch them kneeling down in punishment and mock them. No, some students are not allowed to be punished as per the new bill passed by the government. But he didn’t care for punishment either.

At evening, while he was reading a kids suppliment given free of cost with newspaper he came across a little story. This is the only part of newspaper he cared. Specially designed for kids. Comics, stories, cartoons and fun activities, that’s all are the ingredients of this part. Nevertheless, he read the story which has the moral saying something about Reservation. It was too complex for his little head to understand.

"What is reservation, Papa?” perplexed Pappu asked his father.

“What makes you ask such questions, son?” Guddu dreaded about the situation. He didn’t want to answer the kid. He himself couldn’t understand the issue in the first place.

“I want reservation, dad. All my friends got a reservation.” He announced as his desperation was pushing him at the verge of tears.

“We can’t have a reservation, beta. We just can’t. You can ask anything else if you want.” Guddu was taken aback. He never expected such demand from his kid. Never.

“I want reservation only. Mujhe reservation chahiye, bas, kah diya.” He started crying. He kept repeating his demand between his sobs.

“Alright, alright, kid. Listen, Papa is under too much debt this year. I will buy you reservation next year. Promise. Now my intelligent son will give his Papa a hug. Won’t he?” Guddu made him understand.

Guddu knows that he cannot afford to buy his son reservation. But he still hopes that his son will understand the stupid concept by his next birthday. He isn’t sure about it either, but at the most he can  hope.

~ Based on a short movie 'In this city'.

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