hits

Sunday, July 27, 2014

Untamed pen of a Bhopali.

बारिश में भीगते भोपाल शहर की हरियाली देखते ही बनती है। ऐसा लगता है जैसे पूरे शहर के उपर किसी ने हरा चादर ओढा दिया हो। उस चादर के बीच-बीच मे से झांकती सफेद-पीली सरकारी इमारतें। BHEL के द्वारा बनाये पीले रंग की जर्जर मकानों की दीवारों पर काली-सफेद काई की लकीरें इन खंडहरों की शोभा मे चार चांद लगा रहे है। रिमझिम फुहारों और मनमोहक हरियाली के बीच घिरे टूटे-फूटे इन मकानों से निकलता हल्का-हल्का धुंआ बरबस ही अपनी ओर खींच ले जाता है। अंदर का दृष्य और भी सुहावन। टूटे इंटो के पीढे पर बैठे चार-पाँच युवक देशी शराब के तरलता को सिगरेट की कश के सहारे हलक से नीचे उतार रहे है। उसपर भी कोई बवाल करे तो कहाँ तक उचित है? भगवान शिव ने भी तो विषपान किया था।

बीच-बीच में मोहल्ले की पिंकी, कृति और किरण की बातें छिड जाती है। एक-दूसरे की माता-बहिनों के प्रति संस्कार सूचक शब्दो के बिना तो खैर कोई वाक्य पूरा ही नही होता है। हलांकि दारू-सिगरेट के लिए पैसे का इंतजाम कहाँ से हो रहा है ये सोचने योग्य बात है। चुनाव था तो पैसा भी मिलता था और दारू भी। इज्जत और पूछ परख भी कोई कम ना थी। मुश्किल ये है कि ऐसे रोजगार का अवसर पांच साल मे एक बार ही आता है। लेकिन कहते है कि जहाँ चाह होता है वहाँ राह निकल ही आता है। BHEL ने हजारों की संख्या मे मकान बनवा कर छोडा है। उसमें लकडी-लोहे के खिडकी-दरवाजे किस काम के? जब तक BHEL के मकानों मे खिडकी है तब तक महफिल सकती रहेगी। जिस माध्यम से वो संसाधन जुटाते है वो चोरी कहलाता है लेकिन तभी याद आता है कि जिन नेताओं के लिए इन्होंने प्रचार किया था उनसे ये लाख गुणा अच्छे है। अगर ये मंत्रालय पहुँच जाये तो करोडो-अरबो की चोरी ना होगी। इनकी ना इतनी औकात है, ना इतनी हिम्मत। सरकारी कामकाज के टेक्निकल पचडे मे मत पडिए, हमारे कुछ बडे नेताओं से ज्यादा पढे-लिखे होते है ये अवारा लडके।

खैर बात हो रही थी भोपाल की। भोपाल शहर के सडको के किनारे सरकारी-सार्वजनिक इमारतों के दीवारों पर सुसज्जित लाल-गुलाबी पान-गुटखे की पीक हमारे शहर की पहचान बनते जा रहे है। तरह-तरह की बेतरतीब डिजाइन के नक्शे बनाते पान के जेट दरअसल हमारे कला और संस्कृति के प्रतीक है। ये शहर की खूबसूरती पर एक प्रश्नचिन्ह लगाते निशान से बढकर कुछ और ही है। हलांकि मै समझता हूं कि जिस मुल्क में होली पर रंग लगाने के विवाद में दंगे हो जाते हों, जहाँ मन्दिर-मस्जिद पर लाउडस्पीकर बांधने के लिए कत्लेआम हो जाता हो वहाँ पान के सुर्ख लाल रंग से शहर को रंगने के बाद भी शांति कायम रखना मेरे शहर की उपलब्धि है। मेरे शहर का जर्दा, गर्दा और परदा तो विश्व-प्रसिद्ध है।

दूसरे शहरों की तरह मेरे शहर में भी अघोषित मूत्रालय वहीं होता है जहाँ बडे-बडे शब्दों मे लिखा हो "यहाँ पेशाब करना मना है". अमा कमाल करते हो। प्रकृति से लिया हुआ जल प्रकृति को लौटाने में कैसी मनाही? ये तो धार्मिक कार्य है। तेरा तुझको अर्पण। ये सब एक प्रायोगिक मजाक से कम नही लगता है। सेंस आफ ह्यूमर तो हमारे शहर के जर्रे-जर्रे मे हैं। मानो या ना मानो।

शहर की लडकियों के 'Why should boys have all the fun' वाली स्कूटी के पीछे चलते 'कूल ड्यूड' की मोटरसाईकल उसके पापा की आर्थिक हैसियत का एहसास कराती है। फब्तियाँ कसते उसके मुखारविंद बडी तन्मयता से संस्कारो का पाठ पढा जाते है। बिना लाइसेंस के बाइक दौडाते देश के भविष्य को पकडे जाने पर 30 रूपये से लेकर 300 रूपये तक ट्रैफिक पुलिस वाले को देना पडता है। ये दिल्ली थोडी है कि कह देंगे 'जानता है मेरा बाप कौन है?'. ये भोपाल है भोपाल। यहाँ कानून तोडने पर जुर्माने की रकम आपके Negotiation Skill से तय होती है। Bargaining is the superpower of Indian Middle Class. खैर, जो भी हो। गली के नुक्कड़ पर बैठे अधेड- बुजुर्ग चाय की चुस्की पर कश्मीर और यूक्रेन के मसले सुलझा देते है। अगले ही पल शर्माजी कि बिटिया शार्ट-स्कर्ट पहने गुजरती है तो मुद्दा छिडता है सभ्यता और संस्कृति का। उसके कपडो की लम्बाई के अनुपात मे उसका चरित्र तय होता है। "इसी वजह से तो आजकल बलात्कार की घटनाएं बढ रही है" कहते हुए नेकचंद जी ने सारा साइकोलोजी एक वाक्य में बयान कर दिया। ये न्यूज वाले नाहक ही मामले को तूल दे रहे है। बैठाओ बेटियों को घर में, सारी समस्या का हल मिल गया। सभ्य समाज में संस्कृति के ठेकेदारों ने ही तो आजतक हमारी विराट सभ्यता को बचा रखा है, वरना ये पश्चिमी परिवेश में पल-बढ रहे पथ-भ्रष्ट युवाओं ने तो जैसे असभ्यता के प्रचार का बीडा उठा लिया हो।

भीम-बैठिका के दीवारों पर 'I love you Reena. You are my life.' लिखने वाले युवा ये नही समझते है कि पश्चिमी सभ्यता हमारे बहुमूल्य संस्कारों को दीमक की तरह खोखला किए जा रहे है। देश का भविष्य सेक्स और नग्नता का पुजारी बनता जा रहा है। ये हमारी संस्कृति नही है। होना भी नही चाहिए। खजुराहो और अजन्ता के देश मे नग्नता कतई बर्दाश्त नही किया जाना चाहिए। सारा दोष इस पश्चिमी रहन-सहन और वहाँ की संस्कृति का है। जब हमारे वत्साययन ऋषि कामसूत्र जैसे महान धार्मिक ग्रन्थ की रचना कर रहे थे तब गैलीलियों और कापरनिकस जैसे कुछ तुक्ष मनुष्य पृथ्वी और सूर्य के समीकरणों को खोज रहे थे। ग्राहम बेल टेलीफोन बना रहे थे जिसका विकसित रूप मोबाइल आज हमारे बेटियों के बिगडने का मूल कारण है। उस पश्चिमी सभ्यता से हम सीख भी रहे है तो अश्लीलता? हद्द है।

तम्बाकू को हथेली पर रगड कर होठों मे दबाते जुम्मन चाचा कहते है कि सेक्स भारत की संस्कृति नही है। विश्व की दूसरी सबसे बडी आबादी वाले देश के युवाओं के मन मे सेक्स जैसी नापाक भावना ये अमेरिकी फिल्में ही पनपा रही है। वरना रिप्रोडक्सन तो फोटोसिनथेसिस से भी होता है। अभी मुद्दे ने रंग पकडा ही था कि उनका आठवां बेटा अब्दुल आकर कहता है कि अम्मी बुला रही हैं। जुम्मन चाचा उठ कर चले जाते है। फातिमा चाची पेट से हैं। दसवें का नम्बर है, खयाल तो रखना ही पडेगा। अगर अल्लाह का फजल रहा तो अगले साल तक क्रिकेट टीम तैयार हो जायेगी। गर्भनिरोधक वगैरह अगर पश्चिमी सभ्यता ना होता तो फैमिली प्लानिंग के बारे मे सोच भी लेते।

जुम्मन चाचा चले गये। लेकिन महफिल अभी उठी नही है। उठेगी भी कैसे मियां? ये भोपाल है भोपाल। कहते है शाम होते ही भोपाली जाग जाते है। कहने को बहुत कुछ है लेकिन समय इतना इजाजत नही दे रहा है। समय मिला तो फिर आयेंगे।

चलते है। आप भी चलते रहिए। चलना ही तो जिन्दगी है।

Wednesday, July 16, 2014

The last ritual

"If anyone is going to light his pyre, it would be me. It has to be no one but me. How could they stop me from performing the post-death rituals of my father when I am the eldest child he has? I have rights, too.  No. I won't let Mukesh light the pyre since he is 7 years younger to me." She murmured as she was talking to her image in the mirror.
 
She was all alone in her room, latched from inside. In her family, she has her younger brother, Mukesh and youngest sister, Neha, apart from their parents. She always wanted to prove her worth as her mother used to tell her it-would-be-lot-better-if-you-were-a-boy, almost all her childhood and her adolescent. She was the most obedient child anyone could have ever noticed in her colony. She was the ideal kid by all mean any parent could ever dream off. Ever. Except that she was not a kid. Although, it never mattered to her father but her grandmother always hated her for not being a male. She'd always used to curse her mother for not producing a baby boy, and one day; she died ranting without seeing the baby boy, Mukesh taking birth. Her biggest wish realizes after her death.
****
"But why didn't Aditi light the pyre?" She asked her mother when she came to know that her neighbor had died in a road mishap and his 3 year old child has to perform the rituals, with the help of family, of course.
"Because Aditi is only 6 years old. She is in your class. Doesn't she" her mother told her.
"But Rohit is even younger, and then how come he did that?" She argued.
"Because she is a girl. She can't. She couldn't." Her mother concluded the conversation.
"So does that mean I won't be allowed to light the pyre of father too?" She asked skeptically as she approached her mother behind her in kitchen.
"What made you think such stupid stuffs? You are only 6. Go study." Her mother irked.
"No. I want to know. Now."
"Well, you can't. Now stop irritating me. I have chores to do."
****
 
She clearly remembers all the conversations she ever had after the time when she gained the conscious. She also remembers how her father once told her that she would perform the last rite of his. Although she knew he didn't mean it, but she always wished.
"He always calls me BETA. So that implies that I am his son." A voice raised in her head.
"But you are still a girl. And girls are not allowed to perform any such rites." Another voice in her head countered.
"No. I can and I will. No one would stop me." She decided.
"But the society won't let you. You know that very well."
"Damn the society. I wish I could. It'd be my birthday wish. I want it." She said to herself.
 
A knock on the door has broken her chain of self-conversation. She looked into the clock. It was 12 in the midnight. She stood and opens the door.
"Happy birthday BETA. Many-many happy returns of the day. Ask me whatever you want, my son. What is that you wish for this birthday?" her father asked her as he hugged her and kissed her on her forehead.  She realized that all the crazy things she was thinking when her father is still alive. She couldn't speak.
 
Regret, maybe.
 

Sunday, July 13, 2014

Accidental Human

AD 2025.

“But why can”t we have a car, Papa? I hate walking so long.” Pappu asked his father Guddu as they were returning from his school.
“Because I can”t pay the tax as much as the cost of the car.” , Guddu told his son.

“But most of the kids in my class have cars in their family. How come they can afford it while we can”t? You earn better than them, right?”
“Yes Pappu, I earn more but they don”t have to pay any tax. And we are not discussing this topic, Okay?”

“Okay... Ummm... can we take the bus, then?” kid chuckled.

“You don”t like standing in bus, do you? Seats are reserved for SC/ST and OBCs. We don”t even belong to minority or this state. And please don’t ask anything else for now. I am tired working all day in office.” Guddu replied.

For next 15 minutes, they walked in silence. But the kid was not able to walk any longer, so was the case with his father. They sat on a bench in a park but had to pay a fine of 250 Rs. because the bench was reserved for SC/ST only. As they reached their home, there was no electricity. It was Tuesday. There is power cut on every Tuesday, Thursday and Saturday to provide sufficient power supply to minorities’ houses in order to ensure their upliftment. They slept in boiling hot summer night. They had to. They were from General Category.

Next morning, it was Independence Day. The newspaper was colorful and words appeared as if carved over tricolor. Pappu was elated. He is having a holiday. All his friends also have holiday. Even Ramesh, who got admission in top school of the city with meager 53% marks. Pappu was denied because he was a general category student; despite his 96% marks are better than pappu’s. Marks are just a number. A state of mind. But he never understands why he was denied the admission. Although it felt weird when Ramesh used to tell him about all the interesting stuff he’d do in school. The facilities he boasts about, the English speaking teachers. He envied. It’s least he can do.

But he played all day with his friends. It was much needed holiday. He didn’t care about the homework assignment for which he is gonna be reprimanded for sure. He and few of his friends will be punished while some other will watch them kneeling down in punishment and mock them. No, some students are not allowed to be punished as per the new bill passed by the government. But he didn’t care for punishment either.

At evening, while he was reading a kids suppliment given free of cost with newspaper he came across a little story. This is the only part of newspaper he cared. Specially designed for kids. Comics, stories, cartoons and fun activities, that’s all are the ingredients of this part. Nevertheless, he read the story which has the moral saying something about Reservation. It was too complex for his little head to understand.

"What is reservation, Papa?” perplexed Pappu asked his father.

“What makes you ask such questions, son?” Guddu dreaded about the situation. He didn’t want to answer the kid. He himself couldn’t understand the issue in the first place.

“I want reservation, dad. All my friends got a reservation.” He announced as his desperation was pushing him at the verge of tears.

“We can’t have a reservation, beta. We just can’t. You can ask anything else if you want.” Guddu was taken aback. He never expected such demand from his kid. Never.

“I want reservation only. Mujhe reservation chahiye, bas, kah diya.” He started crying. He kept repeating his demand between his sobs.

“Alright, alright, kid. Listen, Papa is under too much debt this year. I will buy you reservation next year. Promise. Now my intelligent son will give his Papa a hug. Won’t he?” Guddu made him understand.

Guddu knows that he cannot afford to buy his son reservation. But he still hopes that his son will understand the stupid concept by his next birthday. He isn’t sure about it either, but at the most he can  hope.

~ Based on a short movie 'In this city'.

Sunday, June 22, 2014

Why Railway Fare-hike is a wise decision?

Modi Govt. has introduced their first installment of ‘Kadwe-faisle’ for the nation as their train carrying ‘Achchhe Din’ has been delayed by indefinite period of time. Govt. has decided to generate revenue for ailing Indian Railways by introducing a massive fare-hike by 14.2% in all AC and Non-AC reserved and unreserved classes. Protests have been erupted across the nation, as expected. On the other hand, loyalists have started to justify the fare-hike by giving logics which are too irrelevant to be valid in countries like India.
Pseudo-nationalists have already declared this hike as ‘most-needed’ and ‘need of the hour’ even without understanding the basic intention of the govt. for the hike. Reasons like “Hey, we are happily paying Rs. 200 for Auto-Rickshaw but crying for paying Rs. 20 for 50 kilometers in train. Kewl.” And “You have to pay more if you want to enjoy better service. Huh.” can be easily spotted on every nook of social networking websites. Every wannabe-sarcastic Tom, Dick and Harry is trying to prove this hike a welcome move of govt. with such an expertise as if they are the professors of “Benefits of inflation” in Oxford University. Irony is, most of them don’t even know the name of our Railway Minister and most have had passed their Economics paper in third attempt. But then they are loyalists, expecting them to think logically is a sheer mockery of logic. These loyalists are same people who left no stone unturned to criticize previous governments for the same reason: fare-hike.
I think, this fare-hike is least needed step and must be final step of govt. to cure ailing railways. It could have been taken when every other methods fails to deliver. For an instance, if we apply our common sense and basic mathematics, we all are fully aware that trains are running over capacity which simply implies the generation of extra revenue than intended to achieve. Why you need to implement fare-hike, then? Hire more ticket-checkers instead and penalize Without Ticket dwellers to ensure more revenue so that already inflation-hit common man does not need to be burdened with such financial tortures. Having said that, it is quiet logical that hiring more manpower for this purpose need more expenditure initially  but it will bring more collection of fine and penalties and will also ensure better ticket-selling in near future. This will not only justify the recruitment of more people in railway, it will also bring surplus revenue to the railway eventually. By doing so, employment opportunities have been already created per se.
Besides, even if it is extremely needed to impose a fare-hike, couldn’t they wait for 3 more weeks so that it can be done in well planned manner in budget session? If we are to pay some extra amount for the same distance that we travel, we deserve to know where that money is going to be invested, and that could be fulfilled by the budget only, when there will be an extensive debate over it, covering all the pros and cons associated with this. It will also justify the bullshit logic of ‘Accept the hike for better service’ that Bhakts are hurling in their every statement. Any collection of money without proper justification of its purpose and implementation is Extortion. Besides, the same ‘Father-of-development’ , our present Prime Minister had earlier criticized the previous government for implementing fare-hike before budget session in March 2012.
Also, this so called pro-development government is claiming that the decision of incrementing the price was taken by UPA govt. and what they are doing is only implementing. Aah, what a bunch of losers. So they cannot tolerate the governors appointed by UPA, they have no faith in committees and their Chiefs appointed by previous government, they have always criticized their every move, won election by trying to prove that every decision by previous govt. was wrong and here they are showing no hesitation in implementing their decision just because it would help them politically. Shamelessly blaming UPA government is the icing on the cake.
But things are not as simple as it appears to be. What I personally believe that this Rail fare- hike is a politically wise move taken by the govt. which may not do any good for the nation but will surely help BJP as a party. There is a very high probability that present government wanted to avoid any kind of hike or Kadwe Faisle in Budget Session or two-three months beyond that because the Bhartiya Janta Party has to fight assembly elections in states like Delhi and Maharashtra in coming few months and any kind of price-rise or fare-hike will cost them in upcoming elections. We must not forget that we live in a nation where the impacts of controversies and allegations die within a matter of few weeks. This too will settle down soon and people will get ‘used to’ to the revised fare. After then, they can easily fool the people with slogans like ‘Achchhe din’ and ‘good governance’. It is pure politics, my friend. NaMo Brigade is no fool. Instead they are people with Ph.D. in fooling around.
Concluding this topic, I have to say that there will be people who will display their loyalty by defending the fare-hike by giving dumbest reasons possible. I am fed up listening “Give this chap some time. Don’t judge him so soon.” Ironically, people coming up with such statements are the same extraordinary minds who were started to judge Delhi’s Kejriwal government from day one. Hail hypocrisy.
 
Note: Bang your head on nearest wall if feel annoyed, angry, hateful. It may also bring otherwise improbable ACHCHHE DIN.

Monday, May 26, 2014

वो सर्दी मे पानी की बौछारों मे,
वो सडको पर चौराहों मे,
फिर गर्मी की तपती धूप में,
तिहाड के चार-दीवारों मे।

लाठी खायी, डंडे झेले,
अपमान के हर मंजर झेले,
आज साथ खडे है बस कुछेक,
टूटते उम्मीद के दरारों मे।

तू हार नही मानेगा तय है,
तू आजीवन लडेगा तय है,
कोई साथ तेरा दे ना दे मगर,
हम साथ है तेरे है हारों मे।

एक दिन जीतेगा तू है पता,
तू लडता रह, हम साथ सदा,
सत्य झेलेगा दुख लाख मगर,
एकदिन हारेगा झूठ हजारों मे।

Sunday, May 25, 2014

मजबूरी की आग

रात भर बैठी,
मुन्ना के सिरहाने,
अकेले मे माँ कुछ सोचती रही,
आसूओं से पल्लू सिंचती रही,
गुस्से मे दांत भीचती रही,

पर गुस्से से चूल्हे मे आंच नही जलती,
जलता है तो पेट मे भूख की आग,
मुन्ना के रोने की,
भूखे पेट सोने की,
कातर आंखों की,
मासूम सवालो की,
बेबस सिसकारियों की आग,

आज के मजबूरियों को बहला-फसलाने की,
कल के चिन्ता मे आज गंवाने की आग।

मुन्ना अक्सर सवाल करता है,
कि क्यों उसके हिस्से है सिर्फ भूख,
जबकि साथ के सारे बच्चे खुश है,
अपने-अपने घरों में।

कैसे बताये माँ उसको,
कि पिता की मौत के बाद,
घर मे पैसा नही है,
कैसे समझाये उसे,
कि वो औरो जैसा नही है।

क्या बतलाये कि बाबू घूस मांगता है,
पेंशन पास करने को,
जबकि यहाँ तो रोटी नही है,
पापी पेट भरने को।

आज फिर मुन्ना सो जायेगा,
उन्हीं सवालो के साथ,
फिर उठेगा, फिर पूछेगा,
फिर वही जवाब मिलेगा,
मुन्ना का बचपन भी अब कैसे गुजरेगा,
माँ के सीने को छलनी करते सवालो के आग।

आग, जो रोज जलाती है,
यक्ष-प्रश्नों सी आकर रोज,
सामने खडी हो जाती है,
उसे नही मालूम कि क्या हो रहा है देश मे,
उसे मालूम है तो इतना,
कि थोडी देर में मुन्ना जागेगा,
फिर रोटी मांगेगा,
फिर वही दिलासा,
फिर वही झूठ,
फिर झूठी आशा,
कहते है समय सब बदल देता है,
उसे भी उम्मीद है कि बदलेगा सब एक दिन,
मगर तब तक ये सत्य अटल है,
कुछ सवाल घोर प्रबल है।
जिन्दा रहने की जद्दोजहद मे,
जलाये जा रही हैं, मजबूरियों की आग।f

Saturday, May 24, 2014

सुबह की नींद

खिडकी से छन कर आती,
मधम-मधम सी ये धूप,
रोज सुबह मुझे जगा जाती है,
माँ, तेरी याद दिला जाती है,
जब तू रोज जगाती थी बडे प्यार से।
चुपके से माथे को चूम कर,
बालो मे उंगलिया फेरती,
धीमे से तू मेरा नाम पुकारती,
ये जानते हुए कि फिर सो जाऊंगा,
थोडी देर और सोने का बहाना करके,
लेकिन तू कभी गुस्सा नही होती थी,
रोज समझाती थी मुझे बडे प्यार से।

अब कोई नही है जगाने वाला,
लेकिन फिर भी रोज जाग जाते है,
अलार्म बन्द करना तो रोज चाहते है,
पर मजबूरी है माँ, कर नही पाते है,
लेट होने पर office मे डांट पडती है,
Boss नही समझाता कभी हमे प्यार से,
परेशान हो गया है, expectations से,
Target achieve करने की मार से।

एक बार फिर जाना चाहता हूँ माँ,
बचपन के गलियारों मे, दोस्तों मे, यारों में,
जहाँ कोई peer pressure ना हो,
ना हो अंधी दौड, आगे निकल जाने की,
फिर वापस चाहता हूँ माँ, वो बचपन की नींद,
तू फिर जगाये रोज, उसी तरह प्यार से,
तब तक काट रहा हूं दिन, 'अच्छे दिन' के इंतजार मे।

मिल ही जाओगी

रोज देखता हूं तुम्हें, ओखला बस स्टैंड पर,
जहाँ तुम कालेज बस का इंतजार करती हो,
तुम रोज चली जाती हो, हमे अनदेखा करके,
मै रोज वहीं अपना दिल छोड़ आता हूं,
अगली सुबह तक के लिए, जब तुम फिर आओगी
इस उम्मीद मे, कि देर से ही सही, तुम मिल जाओगी,

हां, मोहब्बत है तुमसे, बस जताना नही आता,
तुमसे इजहार करना है, मगर बताना नही आता,
सरे-राह रोक तुमको, मगर सताना नही आता,
तुम्हारे सिवा लेकिन कही जाना नही आता,
कभी तो बताएंगे तुम्हें, और तुम आ जाओगी,
हां उम्मीद है आज भी की मिल ही जाओगी।

वो दिन याद होगा तुम्हें जब जोरो की बारिश हुई थी,
तुम्हारा इम्तिहान था और बस नही आयी थी,
तब जो शख्स आया था तुम्हारे पास, वो मै ही था,
जो आटोरिक्शा को घूस देकर लाया, वो बेवकूफ मै ही था,
एहसान नही गिनाता हूं, पहचान भी जरूरी नही।
बस बताना मुनासिब समझा कि जो रूमाल खो गया था तुम्हारा,
उसको चुपके से चुराने वाला, अमानतदार मै ही था,
जो Physics के नोट्स तुम छोड़ गयी थी बेकार समझ कर,
उसपर अपना एकमात्र हक जताने वाला, हिमाकतदार मै ही था।
वो आज भी मेरे पास है, मेरे स्टडी टेबल पर रखा,
रोज पढने के बहाने, तुम्हें महसूस करता हूं,
रोज पढ लेता हूं तुम्हारे नोट्स से तुमको,
रोज रिविजन करता हूं तुम्हारा, तुम्हें याद करता हूं,
यूं ही पढते-पढते शायद तुम पूरी याद हो जाओगी,
हां उम्मीद है आज भी कि तुम मिल ही जाओगी।

Monday, May 19, 2014

Mumbai as I see it: 01



Coming to Mumbai was a dramatic story in itself, but pointless to mention for the very obvious reasons. After a journey of around 30 hours (OK, I wasn’t nominated for some award for that), I ended up at a Railway Station called VIRAR at 3:00 AM in the morning. Being a Delhiete, I have more than enough reason to worry for it was a small station where construction was on. Going out of a railway station, in a relatively remote area is the last option you’d consider in Delhi. But I was told that it’s not insane to go out at 3 AM in Mumbai, except if you are extremely unlucky. I have got the address where I had to go so the next thing in my mind was to find an Auto-Rickshaw and haggle with them over the price before getting into the auto. Nevertheless, I got an auto rickshaw in a matter of second and I was dumbstruck when he said he will charge the fare according to meter readings.

What! You have a working meter installed in this vehicle? And more importantly, you are going the make this thing decide how much I have to pay? Who on earth possibly does that? You guys need to be trained by our Delhi Autowallahs. How else you going to learn that engineers haven’t invented this thing to give reading. They should be rather used for flaunting, or just as a symbolic representation- similar to the coin-operated pay-phones in public hospitals. Making these innocent meters is a serious crime, something like child-labor.

Nonetheless, I reached the place and slept like a log. Next morning, I was all set for the usual schedule - quest for breakfast. Oh dear lord! This country needs to set up a constitutional right for opening mandatory Parantha-corner in every street of the nation that would sell Aaloo Parantha in breakfast. We can ensure Right-to-Education and Right-to-Equality thing later. Vada-Paav was the only option that I found which sounds familiar and within the budget for I cannot afford restaurants. Dealing with Marathi-speaking people was another stupid experience. Stupid, because most of them know Hindi -or English for that matter- but still expects you to talk in Marathi. It’s fine that you care so much about your mother-tongue and there is nothing wrong about it, even constitutionally. But if you are expecting me to speak the language I don’t understand, I have only two words for you – Fuck-off. No offence, but I mean it.

Bus-stands have a common sight of people queuing up to board the bus. In Delhi, we rather use Rush-and-crush-to-make-your-way to get into buses. Chaos is the simple solution we offer to all such things. People in Mumbai are always in hurry, even though when they don’t have to go anywhere, perhaps because old habits are highly unavoidable. Talking of habits, the people of Mumbai, like any other cities in Indian subcontinents are bound to wave their hands at buses approaching the bus-stands. They sincerely believe that the bus might skip halting at that particular bus stop and they may end-up getting late for their offices where their respective bosses will relive all his/her anger that they must have accumulated during family fights. So in a way, waving at buses is their defense mechanism against potential victimization of their existence.

Roads in Mumbai are not a thing to be proud of when it is compared with their counterparts across the nation. Or maybe it is. See, if you visit the moon and take a quick look of earth from there, there will be only two things visible: The Great Wall of China and the potholes of Mumbai. Some of them are big enough to be used as a water reservoir to ensure water supply for 1/5th of the city. Mathematically speaking, if you calculate the effective surface of the plain road and that of the potholes, you would realize that on a relative scale, the area of plain road can be ignored for its infinitesimally negligible value. However, people still believe in halting at traffic signals (as far as I could observe till now). Had it been in Delhi, the increase in acceleration is inversely proportional to the time left before change in signal turning green to yellow to red. You see, halting at red light is totally pointless, and dangerous for that matter. In Delhi, you simply can’t afford to halt your vehicle at red light not manned by any traffic policeman. If you do so, you might end up being ran over by the vehicle behind you because not everyone is as stupid to care for traffic rules as you are.

People in Mumbai are the real gem, indeed. Hailed from different part of the country and braced it like their own city is what I liked about the place. A city should be treated like one’s mother and she will repay with equal generosity. However, littering is still a great concern and people are still following the Indian rule of cleaning: your house is not clean until you pass the garbage in your neighbors’ compound. A running life with stagnant lifestyle is the identity of the average Mumbaikars. Change is the only constant and things are actually change at a considerable pace, if you consider the recent history. Mumbai has too much to offer, too many stories to tell, too many things to care about. This is indeed a city of dreams.

PS: Mumbai Local, the lifeline of the city has been deliberately omitted because it is not justified to shorten the legacy due to word limits to keep the post shorter. Next post will be dedicated to the Mumbai local, for sure.

PS2: This post is just an observation and not based on any kind of opinion. Every observation are subjected to reconsideration if needed.

Sunday, March 2, 2014

OSCAR का तिरस्कार

अभी सुबह के सिर्फ 11 ही बजे थे कि हमारा Lenovo smartphone घनघना उठा। एक बचपन के मित्र थे दूसरी तरफ जो शायद रोज की तरह वैश्विक घटनाओ पर गहन चर्चा और अपने विचार जबरन सब पर थोपने के आदत से मजबूर होकर अक्सर हमारा नंबर घुमा देते है। अब उनकी भी गलती नही है साहब, कम्पनी की तरफ से मिले मुफ्त के फोन, फ्री टाकटाइम और असीम सियापा कही न कही तो invest करना ही है। लेकिन मै ही क्यों?

"अबे सो रहे हो क्या बे? उठो साले, यहा दुनिया मे क्या क्या हो रहा है और तुम हो कि चादर तान कर पसरे हुए हो अब तक।" मेरे 'हेलौ' बोलने से पहले ही वो शुरू हो गये।

"हुआ क्या बे?" हमे भी फिक्र होने लगी की ऐसा क्या हो गया जो ये इत्ते सदमे मे मरे जा रहे हैं। कही संजना की शादी तो तय नही हो गयी? अब भले उसे याद भी न हो कि हम कभी उसके साथ पढा भी करते थे, पर हम बेवफा कैसे हो सकते है। हमारा प्यार तो सच्चा है, एकतरफा ही सही।

"अबे वो लिडिनियो कैप्री को आस्कर नही मिला बे। सुना है फिक्स है सब। किसी पर भरोसा नही कर सकते है दोस्त।" वो कुछ इस अन्दाज मे बोला जैसे वो खुद अपने IASके आखिरी attempt मे भी फेल हो गया हो।

"अब ये कैप्री कौन है बे?" मै अपनी आवाज की झुझलाहट को रोक नही सका। हलांकि इस बात का सुकून था की उनकी शादी फिक्स नही हुइ अब तक।

"अरे तू उसे नहीं जानता, क्या बे?" वो हमारे फ़िल्मी ज्ञान को धत्ता बताते हुए बोला "अरे अपने टाइटैनिक वाला हीरो। हद्द है भाई।"

"अबे टाइटैनिक वाले का नाम तो शायद Leonardo De Caprio था, ये कही ऑस्कर न मिलने के सदमे से तो नाम नहीं बदल लिया?" हमने भी चुटकी ली।

"अबे हां हां, जो भी हो, नाम में क्या रखा है। वो तो थोडा slip of tongue हो गया था।" अपनी झुंझलाहट को वो भी न रोक सका।

"बहुत slip of tongue हो रहा है बेटा आजकल, बेनी प्रसाद वर्मा के फेन हो गए हो क्या बे?" मैंने फिर एक व्यंग-बाण छोड़ा।

"अबे मजाक नहीं बे, सही में। झूठ नहीं बोल रहे है, न्यूज़ देखो।" वो शायद सचमुच सदमे में था। इत्ते सदमे में तो शायद लिओनार्डो बाबू भी नहीं होंगे।

"T.V. नहीं है बे मेरे पास, और अख़बार मैंने पढ़ा नहीं अब तक" अब मै भी मजे लेने के मूड में आ गया था।

"अबे तो स्मार्टफोन तो है, उसपर तो सब पता चल जाता है" बन्दे ने अपना SHERLOCK HOLMES वाला दिमाग लगा ही दिया।

"अबे कहे का स्मार्टफोन? इतना ही SMART होता तो तेरे फ़ोन आने से पहले ही स्विच ऑफ न हो जाता?" हमने अपने मन में खुद से कहा।

"अबे बोलती क्यों बंद हो गयी?"

"हां सुन रहा हु मै।"

"सब फिक्स है साला? इस बार भी धोखा हुआ है बह@#द!"

"तुम्हे कैसे पता चला बे कि फिक्स है? EDWARD SNOWDEN ने इ-मेल किया था या केजरीवाल के खुलासे में बताया गया है।"

"मजाक नहीं है बे, सच्ची, सब यही बोल रहे है कि फिक्स है।"

"वैसे कौन सी मूवी के लिए नॉमिनेट हुआ था बे ये तेरा CAPRI?"

"कोई THE WOLF OF WALL STREET करके पिक्चर थी। धांसू एक्टिंग किया है साले ने, फिर भी पता नहीं क्यों नहीं मिला ऑस्कर?"

"अच्छा। कैसी पिक्चर है ये? देखि नहीं मैंने अभी तक?"

"देखी तो मैंने भी नहीं है बे, ये साले torrent वाले है न, अब तक अच्छी प्रिंट में नहीं दिए साले कामचोर।"

"फिर तुझे कैसे पता चला कि अच्छी एक्टिंग की है?" मुझे अपना सर दिवार पर मारने का मन कर रहा था, पर फिर 'अपनी बेवकूफी को कैसे जस्टिफाई करूँगा' सोचकर विचार त्याग दिया।

"अबे सब बोल रहे है तो अच्छा ही किया होगा, टाइटैनिक में तो देखा ही होगा तूने, मस्त एक्टिंग किया था न।" वो बड़ी मासूमियत से अपना हर पॉइंट ऑफ़ व्यू मजबूती से मनवाता गया।

अभी मेरा मुह खुलना ही था की वो शुरू हो गया "अच्छा कल का मैच देखा?"...... And the rest you may imagine.

----
Almost Engineer's Blog

I AM BACK: BAKKCHODI RELOADED

बहुत दिनों बाद आये है इन गलियों में, थोडा अजीब लग रहा है. वैसे अजीब लगना वाजिब भी है, अपने ही गांव में 1 साल बाद जाता हूँ तो लोग ऐसे behave करने लगते है जैसे अभी अभी MARS से आया हूँ. ये तो फिर भी इंटरनेट कि दुनिया है. यहाँ तो रिश्ते भी 3G कि गति से बदल जाते है, पहचान के तो फिर क्या कहने?

खैर, हिंदी में लिखने कि कोशिश कर रहा हु कि थोडा देशी नज़र आऊं, बाकि तो सब अंग्रेजी ही हो गया है. उम्मीद का तो पता नहीं पर तमन्ना यही है कि आप लोग मुझे भूले नहीं होंगे. अरे यार, मै भी कहा आपको याद दिल रहा हु, आप तो तमन्ना को भी भूल गए होंगे. अरे वही, अपने विराट बाबू वाली, आइटम (मेरा मतलब... खैर छोड़िये, आप तो स्वयं ही समझदार है). वैसे भी आजकल तो चहु-ओर या तो मोदी छायें है या उनके विरोधी. वैसे अपने केजरीवाल बाबू भी कम नहीं है. अक्सर कहते फिर रहे है कि मोदी कि लीला खास है, बाकि सब फर्स्ट क्लास है.

अरे कहा आप लोग भी न. बड़े वो हो, अब बताओ भला, इत्ते दिनों बाद आये है इंटरनेट पर और आप हो कि न चाय, न दूध, सीधे चर्चा शुरू कर दिए. आप भी झूठ बोल रहे है और हमसे भी बुलवा रहे है सो अलग. हाँ नहीं तो. अब हम सलमान खान तो है नहीं कि आपसे हक़ जताते हुए पूछ ले कि "स्वागत नहीं करोगे हमारा?" कही आपने मना कर दिया तो जो बे-इज्जती-अफजाई होगी सो अलग.

बड़ा शोर है आजकल पॉलिटिक्स का, हर कोई आजकल अपने अपने राज्य के मॉडल का लोहा मनवाने में लगे है. अब चाहे वो अपने गुजरात के भाइयो-एवं-बहनो वाले भैया हो या नीर-उत्तर प्रदेश के कलेश बाबू (अरे अपने अखिलेश बाबू कि बात कर रहे है, अब नाम बदलने से काम थोड़े ही बदल जाता है, काम तो उनका यही है. अमा काम न हुआ FAMILY BUSINESS हो गया, पहले पापा टोपी पहनते थे अब बेटे को हुनर सिखा रहे है.). हाँ तो बात लोहे कि हो रहे थी, तो अपने गुजराती धुरंधर ने तो सुना है पटेल साहब कि मूर्ति बनवाने कि ठान ली है, वो भी दुनिया कि सबहि से बड़हन. ये भी अच्छा है, अभी तक कोई ढंग कि मूर्ति नहीं बनी है. और बनी है तो या तो वो यूपी वाले आंटी जी ने बनवायी है या मुहबोले गांधी परिवार ने. वैसे देखा जाये तो जरुरत नहीं थी हमारे देश में किसी मूर्ति कि, हमारे प्रधानमंत्री जी किसी से कम है क्या?

अब और मुह न खुलवाओ, कही कुछ गलत सलत लिख दिये तो हमारी सल्तनत पर नॉएडा पुलिस कि लाठियों के वार सहन नहीं कर पाएंगे. नेताजी और उनके सुपुत्र का राज है भैया, बच के रहने में ही भलाई है. अंग्रेजी में एक कहावत है कि PREVENTION IS BETTER THAN CURE. अपनी सुरक्षा अपने हाथ. पिट-पुटा गए तो अपनी ही बे-इज्जति होगी, क्यूंकि उनको तो इज्जत कि फिकर है नहीं.

बहरहाल, एक ताज़ा खबर है, इश्क़ हो गया है शायद. अबे हसो नहीं बे, इस बार सच्चा वाला हुआ है, सच्ची, तेरी कसम. अभी बताये नहीं है उनको, एक तरफ़ा प्यार है, इसीलिए ज्यादा टाइम देना पड़ता है. उनके बदले भी तो प्यार करना है. नाम नहीं बताएँगे उनका. वो सीक्रेट वाला है प्यार है. अभी तुमको बता दिया तो साला उनको छोड़ कर सबको पता चल जायेगा. हमारा तो वही हाल हो जायेगा कि खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोडा बारह आना.

खैर..छोडो इन बातो को, अब आ ही गए है तो मिलते रहेंगे... राम राम. OOPS हम तो कम्युनल कि तरह बतिया रहे है.

चलो आज फिर सेक्युलर हो जाते है,
थोडा हिंदुओं को भी गरिया लेते है,
थोडा MINORITY को बहला लेते है.
चलो आज फिर सेक्युलर हो जाते है,



PS: This post is not intended to hurt any person, any community or any organization. But if you still get offended by it, here is set of words for you… F#@K YOU.
There was an error in this gadget

About Me

My photo
Bhopal. Delhi. Mumbai. Thrissur, India
A grammatically challenged blogger. Typos are integral part of blogging